क्यों छिड़ी है महाभियोग प्रस्ताव पर जंग? जानिए, संविधान में इसका अंश

नई दिल्लीः कांग्रेस समेत 7 दलों के 64 नेताओं ने कई दिनों से चल रही सुगबुगाहट के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ राज्य सभा में महाभियोग का प्रस्ताव पेश कर दिया है।

 

जिसे शुक्रवार को राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू तक पहुंचा दिया है। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि, चीफ जस्टिस ने अपने पद का दुरुपयोग किया है।

 

बता दें कि, भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव आया हो। इस तरह का ये पहला मौका है। महाभियोग प्रस्ताव होता क्या है ये जानिए…

 

क्या है महाभियोग?
1. महाभियोग वो प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए किया जाता है।

2. इसका ज़िक्र संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में किया गया है।

3. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज पर कदाचार, अक्षमता और भ्रष्टाचार को लेकर संसद के किसी सदन में जज के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है।

4. नियमों के मुताबिक़, महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।

-लेकिन लोकसभा में इसे पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के दस्तख़त,

-और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के दस्तख़त ज़रूरी होते हैं।

5. जब किसी सदन में यह प्रस्ताव लाया जाता है तो यह प्रस्ताव पर सदन का सभापति या अध्यक्ष के पास अधिकार है कि वह इसे स्वीकार करें या खारिज।

6. सदन के सभापति या अध्यक्ष जो समिति बनाते हैं, वो जज पर लगे आरोपों की जांच करते हैं, फिर अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं।

7. जिसके बाद जज को बचाव करने का मौका दिया जाता है।

8. अगर जांच रिपोर्ट में लगे आरोप सही साबित होते हैं तो बहस प्रस्ताव मंजूरी देते हुए सदन में वोटिंग कराई जाती है।

9. इसके बाद ससंद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से जजों को हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाता है।

10. वहीं राष्ट्रपति के पास जज को हटाने की आखिरी शक्ति है और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जज को हटाया जा सकता है।

बता दें कि, भारत में आज तक किसी जज को महाभियोग लाकर हटाया नहीं गया क्योंकि इससे पहले के सारे मामलों में कार्यवाही कभी पूरी हुई ही नही।