लिंगायत समुदाय के पीछे ही क्यों पड़ी है सभी राजनीतिक पार्टियां? जानिए इसके पीछे का इतिहास

नई दिल्लीः इस देश में कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां जोरों से अपना-अपना प्रचार प्रसार कर रही हैं। जिसके चलते कांग्रेस और बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी राज्य के लिंगायत समुदाय को रिझाने में लगे हुए हैं। बता दें कि, मौजूदा समय में कार्नाटक में कांग्रेस की सत्ता है। वहीं आने वाले चुनाव में बीजेपी की पूरी कोशिश रहेगी कि, वो इस सत्ता को अपने हाथों में लें।

 

 

बता दें कि, लिंगायत समुदाय को राज्य का वोटर बैंक माना जाता है। और ये दोनों ही पार्टियों के मुख से लिंगायत समाज को अपनी ओर खींचना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। लेकिन आप में से कितने लोग लिंगायत समाज को जानते है।

 

 

लिंगायत समाज की संख्या

कर्नाटक में लिंगायत को सबसे बड़ी जाति माना जाता है। राज्य के 18 फीसदी लोग लिंगायत समाज से आते हैं।

 

बासवन्ना समुदाय ने 12वीं सदी में हिंदुओं में व्याप्त जाति व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था।

 

बासवन्ना लिंगायत समुदाय मुर्ति पूजा को नही मानता और शिव की पूजा भी नही करते बल्कि अपने शरीर पर ही इष्टलिंग घारण करते हैं जो कि एक गेंद की आकृति के समान होता है।

 

लिंगायत समुदाय का राजनीति से संबंध…

साल 1989 में जब राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी तो राजीव गांधी ने एक विवाद के चलते तब के सीएम वीरेंद्र पाटिल को पद से हटा दिया, जिससे वजह से लिंगायत समुदाय में आक्रोश की भावना भड़क उठी। और उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़कर रामकृष्णा हेगड़े का दामन थाम लिया। जो कि बीजेपी नेता थे।

 

उनके निधन के बाद फिर येदियुरप्पा को लिंगायतों के नेता बनाया गया। लेकिन जब भाजपा ने भी कांग्रेस का दांव चला और येदियुरप्पा को हटाया तो समुदाय ने भाजपा से भी मुंह मोड़ लिया। और यही वजह है कि, तबसे राज्य में लिंगायत समुदाय की भावनाओं को विशेष महत्व दिया जाता है।

 

क्योकि राज्य में लिंगायत का दामन जिसकी तरफ होगा उसकी जीत पक्की है। क्योंकि, वहां का जनाधार इस समुदाय का सबसे ज्यादा है।

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