जानिए मैं और मेरे जज्बात एवं ब्राम्हण पर विशेष

केसी शर्मा

पहले ब्राम्हण सत्य बोलते थे ,तप करते थे, तथा सोशल डिस्टेंडिंग का पालन करते थे इसलिए हर जगह उनका सम्मान होता था!
लेकिन अब ब्राम्हण अपने लबरापन, लालच, अनुचित लाभ के कारण अनैतिक लोगों को भी प्रिय बोलने के चक्कर में सत्य से दूर हो चुके हैं,
इसलिए अपना भी अपमान कराते हैं ,और समाज का भी अपमान कराते हैं तथा अपनी बेशर्मी को जस्टिफाई करने के लिए उल जलूल तर्क देते हैं ऐसे कलंकी लोगों के कारण ही समाज को अपमानित होना पड़ता है क्योंकि हमारे समाज के अधिकांश लोगों ने सत्यता के बजाय चाटुकारिता का चयन कर लिया गया है,
लेकिन मैं जानना चाहता हूं इन कलंकी लोगों से कि लाभ पाकर क्या करोगे यदि तुम्हारा जमीर ही मर रहा है तो ?

जब हम अपने पूर्वजों की तरह लालच विहीन होंगे तो भले हम कुटिया में रहे ,जंगल में रहे या आश्रम में रहे तब भी चक्रवर्ती सम्राट हमारे आगे सर झुकाते रहे हैं और आगे भी झुकाएंगे, लेकिन यदि हम लालच में आकर हर किसी के आगे सर झुकाते हैं तो हमें कोई अधिकार नहीं कि हम अपने आपको ब्राह्मण कहें ?
दानवीर कर्ण की टक्कर का कोई नहीं था लेकिन उन्होंने मजबूरी वश दुर्योधन का साथ दिया और सब कुछ जानते हुए पराजय स्वीकार की,
इसी प्रकार हमारे समाज के लोग भी भ्रष्ट लोगों का समर्थन करते हैं और कर्ण की तरह अपनी कीर्ति का नाश कर रहे हैं !!

1-वीर बनना है तो भगवान परशुराम की तरह बनो पूरी दुनिया में तुम्हारे टक्कर का कोई ना रहे,
लेकिन राज करने का लालच मत करना!!!
उन्होंने सदैव अत्याचार तथा अत्याचारीयों का नाश किया, धर्म की स्थापना की ,तथा सदैव जीती गई भूमि दान की !
इसलिए आज भी संसार उनको नमन करता है!!
सिर्फ कुछ चिंदी चोर हैं जिनके पुरखों को उनके गलत कार्यों के लिए भगवान परशुराम ने दंडित किया था,
उनके वंशज आज भी तड़पते रहते हैं भगवान परशुराम का नाम लेने पर,
ऐसे जाहिलो को कभी भी अपना मत समझो!!

2-अगर इतना ही शौक है राजसत्ता का तो सीधे लंकेश बनो और सब कुछ स्वयं अर्जित करो क्योंकि संसार में लंकेश से ज्यादा ईश्वर का भोग ना तो किसी ने किया है और ना कभी करेगा और अंत भी ऐसा होगा कि भगवान को मजबूर होना पड़ जाए ?
फिर क्यों तुम लोग मानसिंह और जयचंद का अनुसरण करते हो, गद्दारी करते हो देश और समाज के साथ ?

1- अगर अनुसरण करना ही है,
2-राज सत्ता का लोभ है
3-तो लंकेश की तरह शक्ति अर्जित करके उसका उपभोग करो ?
3-अगर आदर्श बनाना ही है तो आचार्य चाणक्य को बनाओ जिन्होंने प्रतिशोध को महत्व दिया राजसत्ता को महत्व नहीं दिया और अपने प्रतिशोध को कायम रखने के लिए एक चरवाहे को चक्रवर्ती सम्राट बना दिया और उस समय की भारत की सबसे बड़ी राज्य सत्ता को उखाड़ फेंका इतिहास में एक से एक दृष्टांत भरे पड़े हैं.

जब तुम्हारे समाज में स्वयं इतने आदर्श भरे पड़े हैं तो फिर क्यों गद्दार मान सिंह तथा जयचंद जैसे लोगों का अनुसरण करके समाज को कलंकित करने का प्रयास करते हो राजनैतिक दोगले ब्राह्मणों तथा उनके चाटुकार ब्राह्मणों ?