जाने कैसे है वामपंथी नरसंहार का नया हथियार है कोरोना वायरस

थिंक मीडिया न्यूज़ (संतोष तिवारी)

चीन असलियत छिपा रहा है, जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक चीन में कोरोना वायरस से तकरीबन डेढ़ करोड़ लोगों की मौत के अनुमान सामने आने लगे हैं. क्या शी जिनपिंग ने एक तीर से दो शिकार किए हैं. अपनी व्यवस्था पर उन्हें जो बीमार और बुजुर्ग बोझ लगते थे, उनसे छुटकारा पा लिया है. साथ ही दुनिया को अपने बायोलॉजिकल वैपन में उलझाकर बंधक बना दिया है

क्या ये अजीब नहीं है कि चीन में एक वायरस पैदा होता है. पूरी दुनिया में फैल जाता है. लेकिन ये वायरस वामपंथी सोच और व्यवस्था के बेहद करीब है. क्योंकि ये वायरस बीमारों, बुजुर्गों के लिए ज्यादा घातक है. ठीक वैसे, जैसे वामपंथी तानाशाह हमेशा से शारीरिक रूप से कमजोर और बीमार नागरिकों को व्यवस्था पर बोझ समझते रहे हैं. चीन में अब शी जिनपिंग ठीक उसी स्थिति में हैं, जिसमें दुनिया के सबसे कुख्यात वामपंथी तानाशाह मसलन स्टालिन, माओ और खमेर रूज रहे हैं. यह किसी भी वामपंथी तानाशाह को मिलने वाली अकूत ताकत का ऐतिहासिक सच है कि दुनिया नरसंहार (उनके शब्दों में सोशल इंजीनियरिंग) देखती है. अब जो खबरें छनकर आ रही हैं, उनके मुताबिक चीन में कोरोना वायरस से हुई मौत का आंकड़ा बहुत वीभत्स है. तकरीबन डेढ़ करोड़ लोगों की मौत के अनुमान सामने आने लगे हैं. तो क्या शी जिनपिंग ने एक तीर से दो शिकार किए हैं. अपनी व्यवस्था पर उन्हें जो बीमार और बुजुर्ग बोझ लगते थे, उनसे छुटकारा पा लिया है. साथ ही दुनिया को अपने बायोलॉजिकल वैपन में उलझाकर बंधक बना दिया है.

हम कोरोना वायरस के रहस्यमयी रूप से प्रकट होने, दुनिया से इसकी जानकारी छिपाने, फिर पूरी दुनिया में इसके प्रसार के बाद चीन में उद्योग से लेकर जनजीवन तक सामान्य होने की बात का तो विश्लेषण करेंगे ही, यह भी देखेंगे कि इतिहास क्या बताता है. कब किस कम्युनिस्ट तानाशाह ने कितने लोगों का कत्ल किया. पहले बात कोरोना वायरस की. चीन ने 31 दिसंबर को विश्व स्वास्थ्य संगठन को आगाह किया कि उसके हुबई सूबे के वुहान में असामान्य निमुनिया की शिकायत के मामले सामने आए हैं. एक जनवरी को उस सी फूड मार्केट को बंद कर दिया गया, जहां से चीन इसकी उत्पत्ति बता रहा था. चीन ने जिस दौरान इस वायरस की पहचान का नाटक किया, तब तक चीन के मुताबिक ही इससे संक्रमित लोगों की संख्या चालीस हो चुकी थी. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरे दिसंबर इसका प्रसार वुहान में होता रहा और जनवरी आते-आते संक्रमित लोगों की संख्या पचास हजार को पार चुकी थी. अब जो कोरोना स्टडी के लिए मैथमैटिक मॉड्यूल बने हैं, उनसे भी साबित होता है कि चीन ने ये आंकड़ा गलत बताया. इसके बावजूद चीन अपने चिर परिचित हठधर्मी रवैये पर अड़ा रहा. पांच जनवरी को उसने लगभग धमकाने के अंदाज में इस बात का खंडन किया कि ये मामले सार्स (चीन से ही पूर्व में पैदा हुए एक अन्य वायरस) के हो सकते हैं. 2002-2003 में चीन में जन्मे सार्स वायरस से पूरी दुनिया में 770 लोगों की मौत हुई थी. सात जनवरी को चीन ने दुनिया को बताया कि उसने वायरस की पहचान कर ली है. कोरोना वायरस फैमिली के इस वायरस की जानकारी जब तक चीन ने दुनिया को दी, उसके औद्योगिक प्रांत में ये महामारी का रूप ले चुका था. 11 जनवरी को चीन ने पहली आधिकारिक मृत्यु की घोषणा की. चीन के बाहर 13 जनवरी को थाईलैंड में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया.

इसके बाद की कहानी आप सब जानते हैं. दुनिया के 196 देश इस समय कोरोना के सामने थर-थर कांप रहे हैं. भारत तीन हफ्ते के लॉक डाउन में है. इटली में लाशें उठाने के लिए सेना बुला ली गई है. डब्लूएचओ न्यूयार्क को कोरोना वायरस का नया केंद्र बिंदु बता रहा है. स्पेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे विकसित देश भी इस महामारी में उलझे हैं. पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की ओर है. इससे होने वाले नुकसान के आंकड़े भयावह हैं. इसे वर्ष 2008 की आर्थिक मंदी से भी ज्यादा विनाशकारी माना जा रहा है. जबकि पूरी दुनिया लॉकडाउन में है, अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ गए हैं, चीन में सब कुछ सामान्य हो चुका है. उसके उद्योग, बाजार, कारोबार, आर्थिक बाजार सब सामान्य कोराबार की दशा में आ गए हैं. सबसे कमाल की बात ये कि पूरी दुनिया को कोरोना वायरस का तोहफा देने वाले चीन के आर्थिक सूचकांक पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे कम गिरे हैं. तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि चीन ने पूरी दुनिया को कोरोना वायरस में उलझा दिया है. बात बस इतनी ही नहीं है. टेस्टिंग किट से लेकर दवाओं तक दुनिया की निर्भरता चीन पर है. एंटीबॉयोटिक का सबसे ज्यादा उत्पादन चीन करता है. अब चीन अपनी दवाओं की ताकत के दम पर दुनिया को ब्लैकमेल करने की स्थिति में है. सामरिक कहावत है कि बीमार मुल्क जंग नहीं लड़ते. नतीजा ये कि चीन के अलावा किसी भी देश की फौज इस समय युद्ध की हालत में नहीं है. कड़वी लेकिन सच बात ये है कि आज आर्थिक, सामरिक और सामाजिक रूप से चीन दुनिया के सब देशों से बेहतर हालत में खड़ा है. उसने कोरोना वायरस को मौके के तौर पर इस्तेमाल किया है. दुनिया भर में जब स्टॉक मार्केट गिर रहे थे, चीन ने अपनी कंपनियों के शेयर वापस खरीदने में पैसा झोका है. दुनिया के तमाम देशों में चीन की कंपनियां अब पूरी तरह चीन प्रभुत्व वाली हो चुकी हैं.
शी जिनपिंग चीन के सर्वेसर्वा हैं. पोलित ब्यूरो उन्हें इच्छानुसार पद पर अनंत काल तक बने रहने की छूट दे चुका है. यानी चीन में शी जिनपिंग को कोई चुनौती नहीं है. माओत्से तुंग के बाद वह दूसरे नेता हैं, जिनकी चीन पर सत्ता को कोई चुनौती नहीं है. जब भी कोई कम्युनिस्ट नेता इस तरह की ताकत पा जाता है, तो उसका दूसरा सपना पूरी दुनिया पर राज करना ही होता है. चीन के पास यदि कुछ छिपाने के लिए नहीं था, तो उसने अमेरिका सहित किसी भी विदेशी डॉक्टर या वैज्ञानिक को चीन क्यों नहीं आने दिया. अमेरिका और चीन के बीच जो अब आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, उसमें भी कई चीजें बहुत साफ हो जाती हैं. यह वामपंथी फितरत है कि पहले हमला करो और फिर दूसरे पर इल्जाम लगा दो. 12 मार्च से चीन ने इसकी शुरुआत कर दी थी. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि अमेरिकी सेना ने चीन में ये वायरस फैलाया है. शुरू में चीन के प्रति नरम तेवर रखने के बावजूद जैसे-जैसे हकीकत सामने आई, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तेवर भी सख्त हो गए. वह कोरोना या कोविड 19 वायरस की जगह इसे चीनी वायरस कहकर ही बुला रहे हैं. ट्रंप ने साफ आरोप लगा दिया है कि चीन के पास इस वायरस की जानकारी पहले से थी. उसने ये जानकारी छिपाकर पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया है.

इस समय दुनिया में 422829 लोग संक्रमण की चपेट में हैं. 18907 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. पूरी दुनिया पारदर्शिता बरत रही है, लेकिन चीन में कितने लोगों की मौत हुई, इसे लेकर अब तक रहस्य बना हुआ है. न्यूयार्क की रहने वाली हांगकांग की ब्लॉगर जेनिफर जेंग ने दावा किया है कि चीन में वायरस से डेढ़ करोड़ लोगों की मौत हुई है. पिछले दिनों मोबाइल यूजर का डाटा आने के बाद भी इस आशंका को बल मिला था. जनवरी और फरवरी मे चीन में मोबाइल फोन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों ने लाखों उपभोक्ता कम हो जाने का डाटा पेश किया था. तीन प्रमुख सेवा प्रदाताओं के कुल एक करोड़ पचास लाख कन्केशन कम हुए हैं. ऐसे में जबकि मोबाइल यूजर का डाटा लगातार पिछले कई सालों से बढ़ रहा है, एक साथ इतने उपभोक्ताओं के कम हो जाने से इस आशंका को बल मिला है कि इनकी मौत हो चुकी है और चीन इसे छिपा रहा है. वुहान में संक्रमण के चरम पर सेटेलाइट तस्वीरों ने इशारा किया था कि सल्फर डाई आक्साईड की मात्रा वहां बहुत बढ़ जाती है. तब भी कई विशेषज्ञों ने दावा किया था कि ऐसा मानव शरीरों को जलाने के कारण हुआ है.

कोरोना के चलते इटली में 743 लोगों की मौत हो चुकी है. तो क्या शी जिनपिंग की आधुनिक क्रांति की भेंट चीन के डेढ़ करोड़ लोग चढ़ गए हैं. इनमें अधिकतर बच्चे, बीमार और बूढ़े हैं. क्या ऐसा ही कुछ जिनपिंग के कम्युनिस्ट गुरू माओ के राज के दौरान चीन में नहीं हुआ था. चीन में कम्युनिस्ट पार्टी 1949 में सत्ता में आई. ये एक लंबे गृहयुद्ध का नतीजा था. माओ के नेतृत्व में जब वामपंथी सत्ता पर काबिज हुए तो हर कम्युनिस्ट तानाशाह की तरह माओ का सपना आदर्श समाज बनाना था. 1948 में प्रकाशित दस्तावेजों के मुताबिक अपने इस सपने को पूरा करने के लिए माओ का मानना था कि कम से कम एक तिहाई किसानों को रास्ते से हटाना होगा. सात लाख 12 हजार लोगों को सिर्फ राष्ट्रवादी होने के शक में मार दिया गया. इसके बाद माओ के नेतृत्व में चीन में कथित महान क्रांति होनी शुरू हुई. अनाज के बंटवारे की प्राथमिकताएं तय हुई. नतीजा, चीन के इतिहास का सबसे भयंकर अकाल पड़ा. 25 लाख लोगों को यातनाएं देकर मार दिया गया या फिर वे भूखे मर गए. माओ की नीतियों, अकाल और कथित सांस्कृतिक क्रांति के कारण कुल सात करोड़ सत्तर लाख लोगों की जान गई. आप जरा सोचिए, माओ का कहना था कि गौरेया एक साल में साढ़े चार किलो अनाज खाती है. वह समाज की दुश्मन है. पूरे चीन में लोगों को गौरेया मारने का प्रशिक्षण दिया गया. जब ये अभियान चला तो पहले ही दिन दो लाख गौरेया मार दी गईं. वामपंथी इतिहास इसी तरह की सनक और खूनखराबे से भरा पड़ा है. जोसेफ स्टालिन, फिदेल कास्त्रो, खमेर रूज भी नरसंहारों के प्रतीक हैं. बुल्गारिया हो या फिर रोमानिया या फिर युगोस्लाविया, वामपंथियों ने सत्ता की सनक में कमजोर नागरिकों का खून बहाया है. वियतनाम से लेकर उत्तर कोरिया तक वामपंथी तानाशाहों की खूनी सनक इतिहास में दर्ज है.

तो क्या शी जिनपिंग इस कड़ी में अगला नाम हैं. दुनिया कोरोना वायरस के बाद पहले जैसी नहीं रहेगी. वामपंथियों को जब-जब अमेरिका ने गले लगाया है, मुंह की खाई है. इस बार भी अमेरिका को महसूस हो रहा है कि कारोबार की आड़ में छिपा चीन का असली वामपंथी चेहरा अब सामने आ रहा है. दुनिया की दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था पर सवार शी जिनपिंग अपने पूर्ववर्ती कम्युनिस्ट तानाशाहों से बड़ा खतरा बन सकते हैं. आने वाले समय में तमाम जांच होंगी, अध्ययन होंगे और उनका निशाना यही होगा कि कोरोना वायरस कहां से आया. आज नहीं तो कल, दुनिया ये जान जाएगी कि चीन ने किस प्रकार एक वायरस के जरिये दो विश्व युद्धों में प्रभावित मुल्कों से ज्यादा देशों को अपनी चपेट में ले लिया.