गजब रिवाज़! यहां शादी में मर्दों के भरे जाते है मांग

सुहाग की निशानी हमेशा एक पत्नी पर ही थोपी जाती है। फिर चाहे वो पति के नाम का सिंदूर हो या उसके नाम का मंगलसूत्र, इन सब चीजों के भार को हमेशा पत्नियां ही उठाती है। आपने देखा ही होगा कि, शादी होते ही महिलाओं के मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और पैरों कि उंगलियों में बिछुओं का पहनाना एक जरूरी श्रृंगार बना दिया जाता है। जबकि, वहीं एक शादी-शुदा मर्द पहले की तरह ही तरह है। उसके लिए इस तरह के श्रृंगार का कोई नियम नही बनाया गया है।

 

लेकिन एक ऐसा भी राज्य है जहां पर शादी के दिन पुरूष नहीं बल्कि महिलाएं अपने होने वाले पति का मांग भरती है। ये गांव आपको छत्तीसगढ़ में मिल जाता है। यहां के जशपुर जिले में ये परंपरा सदियों से निभाई जा रही है।

 

जिसके चलते यहां की शादी बेहद अनूठी मानी जाती है। विवाह की सभी रस्में आम ही होती है। मंगल मंत्र पढ़े जाते हैं। लेकिन सात जन्मों के सूत्र में बंधने से पहले यहां एक रवायत है, जो इस जनजाति की शादी को दूसरी शादी से सबसे अलग बनाती है।

 

यहां के लोगों के मुताबिक, शादी में दुल्हन के साथ-साथ दूल्हे की मांग में भी सिंदूर लगाया जाता है। शादी से पहले वर-वधु पक्ष साथ में बाजार जाते हैं और एक साथ सिंदूर खरीदते हैं। अगले दिन शादी के वक्त दूल्हा-दुल्हन उसी सिंदूर से एक-दूसरे की मांग भरते हैं।

 

यहां के लोगों की मान्यता है कि इस तरह के सिंदूर दान से वैवाहिक रिश्तों में बराबरी का अहसास होता है।

ऐसे निभाते हैं ये रस्म….

– दूल्हन के घर के पास बगीचे में दूल्हा उसके घर से आमंत्रण का इंतजार करता है।

– इसके बाद दुल्हन के रिश्तेदार दूल्हे के पास पहुंचते हैं और उसे कंधे पर बैठाकर विवाह के मंडप में ले आते हैं।

– विवाह के मंडप में दुल्हन का भाई अपनी बहन की उंगली पकड़ता है औऱ दुल्हन अपने भाई के सहारे से बिना देखे पीछे हाथ करके दूल्हे की मांग भरती है।

– अगर दुल्हन के भाई नही होते तो उनकी बहने ये रस्म अदा कर सकती है।