पढ़े महाभारत पर विशेष : थिंक मीडिया न्यूज़ पर

थिंक मीडिया न्यूज़ -के सी शर्मा

कृष्ण द्वैपायन व्यास के द्वारा वैशम्पायन को सुनाया गया 8800 श्लोकों वाला जय’ नामक ग्रन्थ इसका मूल ग्रन्थ था।

स्वयं महाभारत में कहा गया है कि व्यास ने तीन वर्ष लगातार परिश्रम करके इस अद्भुत आख्यान महाभारत (भारत) की रचना की।

वैशम्पायन के द्वारा जनमेजय को सुनाया गया। 24000 श्लोकों वाला भारत नामक ग्रन्थ जय का द्वितीय संस्करण था।

”चतुर्विशति साहस्त्री चक्के भारत संहिताय’’ (महाभारत)

लोमहर्षण के पुत्र (सौत) के द्वारा स्त्रवणक आदि ऋषियों को सुनाया गया विविध आख्यान एवं उपाख्यानों का जो एक लाख श्लोकों वाला वर्तमान समय में प्राप्त महाभारत ही उसका तृतीय संस्करण है।

होपकिन्स ने दार्शनिक कुमारिल भट्ट, सुवंग तथा वाण के ग्रन्थों तथा कम्बोडिया से प्राप्त शिलालेखों में महाभारत के स्पष्ट उल्लेखों के आधार पर महाभारत का रचना काल चौथी शताब्दी) र्इ. पू. में किया है।

गुप्तकालीन एक शिलालेख में (445 र्इ.) महाभारत को व्यास कृत सत् साहस्त्री संहिता कहा गया है। इससे प्रतीत होता है कि कम से कम गुप्त काल के दौ सौ वर्षों के पूर्व इसका अस्तित्व अवश्य ही रहा होगा।

भास के नाटक चक्र में अधिकांश नाटकों के कथानक महाभारत से लिये गये है। भास का समय 350 र्इ. पू. निश्चित हो चुका है। अत: यह सिद्ध है कि 350 र्इ. तक महाभारत भी एक उपजीव्य ग्रन्थ माना जाने लगा था।

वैयाकरण पाणिनी ने युधिष्ठिर, विदुर, तथा भीम आदि नामों की व्युत्पत्ति बतायी है जिससे पाणिनी (500) र्इ. पूर्व महाभारत की पूर्व वार्णिता स्वत: सिद्ध होती हैं।

डा. जयचन्द्र विद्यालंकार भी महाभारत की रचना 500 र्इ. पू. स्वीकार करते है।

महाभारत में बुद्ध का उल्लेख प्राप्त होता है, अत: डा. वेदालंकार महाभारत की रचना छठी शताब्दी र्इ. पू. से 100 वर्ष पूर्व से पहले की मानते है।

कल्प सूत्रों में महाभारत के बारे में महत्त्वपूर्ण चर्चा प्राप्त होती है।

वौधायन सूत्र में विष्णु सहरत्य नाम का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है जो कि महाभारत का ही एक अंश है तथा साथ ही भगवद्गीता का यह प्रसिद्ध श्लोक पत्रं पुष्पं फलम् यो में भक्तयां प्रक्ष्यति आदि श्लोक उद्घृत हैं।

सांख्यायन सौत्र सूत्र में कौरवों के विनाशकारी युद्ध का वर्णन प्राप्त है अत: यह सिद्ध होता है कि महाभारत के प्रथम संस्करण की रचना सूत्रकाल से पहले तथा उत्तरकाल का अन्त होते ही प्रारम्भ हो चुकी थी।

डा. विन्टरनित्ज ने भी मूल कथानक एवं उसके कुछ आख्यानों का विश्लेषण कर बताया हैं कि उसकी स्थापना प्राचीन उत्तर वैदिक कालीन साहित्य में भी है।

महाभारत में भी लिखा गया है कि यह सर्वप्रधान काव्य एवं सब दर्शनों का सार स्मृति इतिहास चरित्र चित्रण की खान व पंचम वेद है जैसे दही में मक्खन, मनुष्यों में ब्राह्मण, वेदों में आरण्यक, औषधियों में अमृत और चतुष्पादों में गौरश्रेष्ठ है। उसी प्रकार समस्त इतिहास में भारत श्रेष्ठ है।

काल की इस विस्तृत सीमा को दृष्टि में रखकर यह कहा जा सकता है कि महाभारत की रचना 800 र्इ. पू. से प्रारम्भ हो गयी थी। इसका अंतिम लक्ष्य श्लोकी संस्करण र्इसा पूर्व चौथी या पांचवी शताब्दी र्इसा पूर्व तक निर्मित है।

महाभारत हमारे प्राचीन भारतीय इतिहास का अमर स्मारक है।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों के विषय में महाभारत में जो कुछ कहा गया है वही अन्य है । जो यहां नहीं है वह कहीं नहीं है।

वेद, धर्मशास्त्र तथा सभी पुराण मिलकर भी महाभारत की तुलना नहीं कर सकते है। ऐसा काव्य जिसकी रचना में कोर्इ कवि वैशिष्ट्य नहीं ला सकता।

महाभारत संस्कृत साहित्य के अनेक काव्यों, महाकाव्यों तथा नाटकों का जन्मदाता है।

नाटककार भास से लेकर 13 वीं शताब्दी के अगस्त्य कवि की कृतियों में सर्वत्र महाभारत की छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। रामायण के पश्चात् महाभारत ही सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।

संस्कृति, सभ्यता का महाभारत में जितना विशुद्ध चित्रण मिलता है उतना किसी अन्य ग्रन्थ में दुर्लभ है।

महाभारत का वास्तविक सांस्कृतिक महत्व भगवद्गीता के कारण है।

गीता हिन्दुओं के लिए न केवल आचार संहिता है। अपितु वेद के समकक्ष एक धर्मग्रन्थ है।

महाभारत में विभिन्न संस्कृतियों का सम्मिश्रण, राष्ट्रीय भावना का उदय, आसुरी प्रवृत्तियों के दमन का प्रयास, भौगोलिक अनेकता में एकता, जीवन दर्शन की व्यावहारिक दृष्टि से व्याख्या, अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, महिलाओं में अवलत्व के परित्याग की प्रवृत्ति, राजनीति, कूटनीति ,छद्मनीति, दण्डनीति का अनीतिका व्यावहारिक प्रदर्शन, राजधर्म का सर्वागीण निरूपण ,आख्यान साहित्य का अक्षयकोष, नीतिशास़्त्र की बहुमूल्य एवं चतुवर्ग की सभी समस्याओं का समाधान है।

महाभारत में एक ओर जहाँ राजधर्म का उपेदश है वहीं दूसरी ओर मोक्ष धर्म। जहाँ एक ओर अशान्ति है वहीं दूसरी शान्ति की चर्चा भी, एक तरफ कर्म मार्ग है तो दूसरी तरफ तत्व ज्ञान मार्ग।

महाभारत का उद्देश्य मनुष्य जगत में भौतिक जीवन की निस्सारता को दिखाकर उसे मोक्ष मार्ग पर निर्दिश करना है। यही कारण है कि महाभारत को काव्य शास्त्रियों ने शान्त प्रधान ग्रन्थ माना है।

आचार्य विश्वनाथ ने भी इसे आदिकाव्य कहा है।

महाभारत एक विशाल विश्वकोष है जिसमें प्राचीन भारत की ऐतिहासिक, धार्मिक, नैतिक तथा दैनिक आदर्शों की अमूल्य निधि है । वेदों आदि का दर्शन करके भी जिसने महाभारत नहीं पढ़ा वह विलक्षण नहीं कहा जा सकता है।